[एपिसोड 2 — कोई और भीतर आ गया]
दरवाज़े का हैंडल पीतल का था। मैंने हाथ बढ़ाया, फिर ठिठक गई।

उँगलियाँ पतली थीं। नाखून गोल और चिकने थे, जैसे किसी ने उन्हें सँवारा हो। मैंने कभी अपने नाखून नहीं सँवारे। न इसका समय था, न कोई वजह। ऐसा लगा जैसे किसी और के हाथ से किसी और का दरवाज़ा खोल रही हूँ। नहीं, यह एहसास नहीं था। यह सच था।
मैंने धकेला। दरवाज़ा भारी नहीं था।
पहले कॉफ़ी की खुशबू आई। फिर लकड़ी की, फिर काग़ज़ की। छत तक पहुँचती किताबों की अलमारियाँ, धीमी जलती बत्तियाँ, गहरे रंग की लकड़ी की कुछ मेज़ें। यह कैफ़े कम और किसी का अध्ययन-कक्ष ज़्यादा लगता था। चौंतीस साल की उम्र में मैं कभी ऐसी जगह नहीं बैठी थी। ऐसी जगहें मुझ जैसे लोगों के लिए नहीं थीं। इसलिए जिस आरामदेह माहौल से मुझे सुकून मिलना चाहिए था, उसी ने मुझे बेचैन कर दिया।
काउंटर के पीछे एक आदमी था। गिलास पोंछते हुए उसने सिर उठाया।
"स्वागत है… हम्म?? आपको दरवाज़ा कैसे मिला?"
"जी??"
यह अजीब अभिवादन था। स्वागत नहीं, बल्कि दरवाज़ा मिलने का सवाल। वह आदमी मुझे देख रहा था। ठीक-ठीक कहूँ तो उसकी आँखें मुझे देख रही थीं, पर जैसे मुझे देख ही नहीं रही थीं। ठंडी आँखें। वह सुंदर है, यह ख़याल एक पल बाद आया। उससे पहले यह एहसास आया कि मुझसे कुछ ग़लत हो गया है।
"माफ़ कीजिए। क्या अभी खुला नहीं है? क्या यह नई जगह है? अभी काम चल रहा है…?"
ऐसा कोई बोर्ड तो नहीं था। बाहर से देखने पर बत्तियाँ ज़रूर जल रही थीं। मैं बात अधूरी छोड़कर पीछे हटने लगी। जाना-पहचाना तरीका। जहाँ नहीं आना चाहिए था, वहाँ से चुपचाप निकल जाना। यह मुझे अच्छे से आता है।

"वहाँ सँभलकर…"
"अरे-अरे~~"
मेरी एड़ी दहलीज़ में अटक गई। शरीर पीछे की ओर झुक गया। यह शरीर मेरे शरीर से हल्का था, इसलिए गिरा भी तेज़ी से।
पर मैं ज़मीन पर नहीं गिरी।
मेरी कमर पर एक हाथ था। वही आदमी था। जो आदमी काउंटर के पीछे था, वह अचानक मेरे सामने था। दौड़कर आने के लिए बहुत ख़ामोश, चलकर आने के लिए बहुत दूर। वह उड़कर आया था। इसके सिवा कहने का कोई और तरीका नहीं था। वह रफ़्तार इंसानी कहना मुश्किल था।
हमारी आँखें मिलीं।

मेरा चेहरा तमतमा उठा। मैंने नज़रें फेर लीं। चौंतीस साल की होकर, एक आदमी ने एक बार कमर थाम ली तो लाल हो जाना। यह शरीर अजीब है या मैं, यह सोचने के उस छोटे से पल में—
आदमी का चेहरा बिगड़ गया।
"कोई और भीतर आ गया है।"
उसका मतलब पूछने का समय ही नहीं मिला। उसने मुझे वैसे ही झटककर फेंक दिया। मैं कंधे के बल फ़र्श पर गिरी। दर्द हुआ। दर्द से ज़्यादा झटका लगा। यह वही हाथ था जिसने अभी-अभी मुझे थामा था।

"तू कौन है, जो उस लड़की के शरीर में घुस आया!"
आदमी चिल्लाया। गुस्से भरी आवाज़। नहीं, गुस्सा शब्द काफ़ी नहीं था। उस आवाज़ से कमरे की हवा एकदम भारी हो गई। बत्तियाँ हिलती-सी लगीं। मेरी साँस मुश्किल से चल रही थी।
मुझे डर लगा। ऐसा डर जिसकी कोई वजह मैं नहीं बता सकती थी। चौंतीस साल की एक वयस्क, पहली बार देखे कैफ़े के फ़र्श पर बैठी, आँसू फूट पड़ने को थे। जब मेरी किराये की जमा-राशि डूबी, तब भी मैं नहीं रोई। आईसीयू की खिड़की के सामने भी नहीं रोई। पर जब यह आदमी चिल्लाया, तो रोने का मन हुआ। गला रुँध गया। मुझे वजह नहीं पता थी। तब नहीं पता थी।

"ऊनवू, शांत हो जाओ।"
आवाज़ दूसरी मंज़िल की सीढ़ियों की ओर से आई। साफ़, निर्मल आवाज़, बिना किसी कंपन के स्थिर। अगर फ़रिश्तों की आवाज़ होती, तो शायद ऐसी ही होती। उस एक आवाज़ से मेरा रुँधा गला खुल गया।
"तुम इन्हें डरा रहे हो, ऊनवू। इन्होंने अपनी मर्ज़ी से ऐसा नहीं चाहा होगा।"
सीढ़ियों से दो लोग उतर रहे थे। आगे एक आदमी था जिसका चेहरा कुछ कम उम्र का-सा लगता था। उसने सलीके से हानबोक पहना था। उसके पीछे एक हट्टा-कट्टा आदमी उतरा, जो उसका सहायक लगता था। उसने भी हानबोक पहना था। अब देखा तो काउंटर वाले आदमी ने भी आधुनिक हानबोक जैसा कुछ पहना था। कोई थीम कैफ़े है क्या? ऐसा सोचने की फ़ुर्सत नहीं थी, फिर भी यह ख़याल आ ही गया।

कम उम्र-सा दिखने वाला आदमी मेरे पास आया। वह चलकर नहीं, जैसे सरककर आया। उसने हाथ बढ़ाकर मुझे उठाया और हल्के से मुस्कुराया।
यह अजीब था। अभी-अभी मैं डर से रोने को थी, पर उस एक मुस्कान से मन किसी तरह हल्का हो गया। कोई वजह नहीं थी। बस हल्का हो गया।
"आपसे मिलकर ख़ुशी हुई, जियान जी। मैं कैफ़े QUANTARO का मालिक चा वूजिन हूँ। ये हमारे बरिस्ता मून ऊनवू हैं। और मेरे साथ नीचे आए ये हट्टे-कट्टे साथी छोए गनवू हैं।"
"आपसे मिलकर ख़ुशी हुई, जियान जी। मैं छोए गनवू हूँ।"
हट्टे-कट्टे आदमी ने बस इतना कहा और एक कदम पीछे हट गया। उसकी आवाज़ धीमी थी और चेहरा भावहीन।
मैंने तीनों को बारी-बारी देखा। यहाँ का हर आदमी अपने-अपने आकर्षण से भरा, सचमुच सुंदर था। यह इन बातों में ध्यान भटकाने का समय नहीं था। इस शरीर में आने के बाद से मेरी नज़र बार-बार ग़लत चीज़ों पर जा रही थी। या शायद मैं हमेशा से ऐसी ही थी, बस कभी देखने का मौका नहीं मिला।
मैं एक पल को ख़यालों में खोई थी, तभी मून ऊनवू ने जैसे पल भर को सिर झुकाया और फिर हड़बड़ी में बोला।
"सर, वह इंसान नहीं है! नहीं, वह न ज़िंदा है न मरा हुआ! इसे तुरंत हटाना होगा!!"
हटाना।
वह शब्द मेरे शरीर में कहीं धँस गया। न ज़िंदा न मरा हुआ — यह वही बात थी जो मैंने आईसीयू की खिड़की के सामने ख़ुद से कही थी। यह आदमी उसे कैसे जानता है, उससे ज़्यादा उसके बाद आया शब्द ज़ोर से गूँजा।
"ऊनवू, मैंने कहा न शांत हो जाओ। मैं भी जानता हूँ।"
चा वूजिन अब भी मुस्कुरा रहे थे।
"अगर वह यहाँ आई है, तो यह भी ईश्वर की इच्छा होगी। वह कोई दुष्ट आत्मा नहीं है। प्रतिशोधी भूत भी नहीं। किसी कारण से वह बस कुछ समय के लिए दूसरे शरीर में आ गई है। हमें उस कारण को खोजने में उसकी मदद करनी होगी।"
मून ऊनवू का मुँह खुला और बंद हो गया।
"संयोग से ऊनवू इस पूरे हफ़्ते छुट्टी पर है, तो वह कारण खोजने में उसकी मदद कर सकता है।"
"क्या???!!! इसका क्या मतलब…"
"ऊनवू।"
बस एक शब्द। आवाज़ ऊँची भी नहीं हुई। फिर भी मून ऊनवू वहीं रुक गया, दाँत भींचे हुए। यह देखकर मैं इस कैफ़े का क्रम समझ गई। और यह भी कि कुछ लोग आवाज़ ऊँची किए बिना ही दूसरों को रोक सकते हैं।
"जियान जी, बैठिए। खड़ी रहेंगी तो पैर काँपेंगे।"
वे काँप रहे थे। मैं कहे अनुसार बैठ गई। लकड़ी की कुर्सी ठंडी थी, फिर जल्द ही गर्म हो गई।
छोए गनवू एक कप रखकर चला गया। बिना कुछ कहे। कॉफ़ी थी। मैंने उसे छुआ नहीं। किसी और के हाथ से किसी और का कप उठाना अभी भी बहुत ज़्यादा था।

चा वूजिन मेरे सामने बैठ गए। मून ऊनवू काउंटर के पीछे नहीं लौटा, बल्कि एक खंभे के पास हाथ बाँधे खड़ा रहा। वह मुझे लगातार देखता रहा। उन्हीं हाथों को बाँधे जिन्होंने अभी-अभी मेरी कमर थामी थी, उन्हीं आँखों से देखता हुआ जिन्होंने अभी-अभी मुझे फेंक दिया था।
मैंने पूछा। घुमा-फिराकर बात करने की ताक़त मुझमें नहीं बची थी।
"मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?"
"यह तो आपको ख़ुद ढूँढना होगा, जियान।"
"क्या मैं वापस जा सकती हूँ?"
"वह भी।"
चा वूजिन मुस्कुराता रहा और कुछ नहीं बोला। अजीब बात थी, मुझे ग़ुस्सा नहीं आया। उसकी जगह कुछ और आया।
"यह दरवाज़ा हर किसी को नहीं दिखता। आपने इसे देखा, जियान, यही पहला सुराग है।"
दरवाज़ा। वह दरवाज़ा जो कल तक था ही नहीं। वह दरवाज़ा जो सिर्फ़ मुझे दिखा। मैंने सिर हिलाया। और सिर हिलाते-हिलाते, एक पल देर से मुझे समझ आया।
मैंने इन लोगों को कभी अपना नाम बताया ही नहीं था।
आपसे मिलकर ख़ुशी हुई, जियान। उसने शुरू से मुझे यही कहकर बुलाया था। इस शरीर का नाम नहीं, मेरा नाम। मैंने पूछने के लिए मुँह खोला। पर चा वूजिन पहले बोल पड़ा।
"आज रात जाने के लिए कोई जगह है?"
नहीं थी। मुझे नहीं पता था कि यह शरीर कहाँ रहता है। मेरे छोटे से गोसीवॉन कमरे की चाबी ICU में पड़ी उस औरत के बैग में थी। कहीं जाने की जगह न होना मेरे लिए नया नहीं था, पर इस बार उस जानी-पहचानी हालत से ज़रा भी तसल्ली नहीं मिली।
चा वूजिन उठा। फिर आकर मेरे बगल में बैठ गया। सामने नहीं, बगल में।
"जियान।"
"…जी।"
"इसमें आपकी कोई ग़लती नहीं है, जियान।"

उन शब्दों पर भीतर कुछ टूट गया। जब मेरी जमा-पूँजी डूबी थी, तब किसी ने यह नहीं कहा था। न सीढ़ियों से गिरने पर, न ICU की खिड़की के सामने। किसी ने नहीं कहा कि यह मेरी ग़लती नहीं है। ख़ुद मैंने भी नहीं। मैं हमेशा पहले ख़ुद को ही दोष देती थी। बदक़िस्मती भी आख़िर मेरी तक़दीर ही तो थी।
"वजह जो भी हो, वह आपकी बनाई हुई नहीं है, जियान। इसलिए यहाँ निश्चिंत रहिए। यहाँ कोई आपको नुकसान नहीं पहुँचाएगा। मैं ऐसा होने ही नहीं दूँगा।"
मेरी आँखें भर आने को थीं। पहले वाले आँसुओं से अलग आँसू। डर से नहीं, बल्कि इसलिए कि किसी ने कहा था कि वह मेरी तरफ़ है। ऐसे शब्द जो चौंतीस साल में कभी नहीं सुने थे। उसी पल मेरा मन किया कि इस कमसिन चेहरे वाले आदमी का सहारा ले लूँ। तब मुझे नहीं पता था कि वह एहसास कितना ख़तरनाक है।
"…धन्यवाद।"
"धन्यवाद की कोई ज़रूरत नहीं। ऊनवू आपकी मदद करेगा।"
खंभे के पास खड़े आदमी ने खुलकर मुँह बनाया। चा वूजिन ने यह देखा, फिर भी मुस्कुराया और उठ खड़ा हुआ।
"मैं ऊपर जाता हूँ। ऊनवू, तुम पर भरोसा है।"
"…जी, हुज़ूर।"
चा वूजिन सीढ़ियाँ चढ़ गया। छोए गनवू परछाईं की तरह उसके पीछे-पीछे गया। उनके जाते ही कैफ़े अचानक बड़ा लगने लगा। बचे थे सिर्फ़ मैं और वह आदमी जिसने मुझे पटक दिया था।
चुप्पी लंबी थी। मैं कप से खेलती रही, और मून ऊनवू हाथ बाँधे मुझे देखता रहा। वह हाथ जिसने मेरी कमर थामी थी, वह आवाज़ जो चिल्लाई थी। उसके साथ अकेले बैठकर मुझे समझ नहीं आ रहा था कि नज़रें कहाँ टिकाऊँ।
पहले वही बोला।
"तो तुम यहीं रुकने वाली हो?"
"…नहीं, मेरा मतलब…"
"जाने की कोई जगह है?"
मैं ना नहीं कह सकी। पर शायद मेरे चेहरे पर सब लिखा था। मून ऊनवू ने आह और च्च के बीच की कोई आवाज़ निकाली, और अपने चोगे के भीतर से कुछ निकाला।
पत्ते थे। पूरी एक गड्डी। वह उन्हें हाथों में फेंटने लगा, ऐसे चेहरे के साथ मानो कोई चारा न हो। अनचाहा काम करने वाले की हरकतें थीं, फिर भी उसके हाथ अजीब तरह से तेज़ थे।

"तीन नंबर बोलो। जो भी अभी मन में आए।"
"…जी?"
"तीन। कोई भी।"
अचानक??? यह क्या चल रहा है? मैंने उसे देखा। वह सिर्फ़ पत्तों को देख रहा था। समझाने का उसका कोई इरादा नहीं लगा। हड़बड़ाहट में, जो मन में आया, मैंने बोल दिया।
"…सत्रह। चौंतीस। तीन।"
बाद में जाकर समझ आया कि उनमें मेरी उम्र भी आ गई थी।
मून ऊनवू की आँखों से रोशनी निकली।
नीली रोशनी। मुझे भ्रम नहीं हुआ था। उसकी पुतलियों के भीतर गहरे में कुछ नीला जल उठा। उसी पल उसके हाथों के दर्जनों पत्तों में से तीन उसी नीले रंग में चमके और हवा में तैर गए। तीनों पत्ते हवा में आपस में फेंटे जाने लगे। कोई उन्हें घुमा नहीं रहा था, फिर भी वे फेंटे जा रहे थे। फिर एक-एक करके, धीरे-धीरे पलटते हुए, मेरे सामने मेज़ पर आ टिके।

मैं साँस रोके देखती रही। इस शरीर में आने के बाद से बहुत अजीब चीज़ें झेली थीं, पर आँखों के सामने पत्ते उड़ते पहली बार देखे थे।
मून ऊनवू ने तीनों पत्तों को नीचे देखा। पहला, दूसरा। चेहरे पर कोई भाव नहीं। तीसरे पर उसकी भौंह ज़रा सी हिली।

"पहले उस जगह वापस जाओ जहाँ अदला-बदली हुई थी।"
"…जी?"
"उस जगह जाओ जहाँ तुम्हारी अपने असली शरीर से अदला-बदली हुई थी। वहाँ जाओगी तो सोने की जगह मिल जाएगी। और उस शरीर के बारे में भी, वहीं जवाब मिलेंगे।"
सीढ़ियाँ। गोसीवॉन की सीढ़ियाँ। मैं दोबारा पूछने ही वाली थी कि उसकी अगली बात ने मुझे रोक दिया।
"तुम्हारा मन बेचा… हम्म… रहने दो। ज़रूरत से ज़्यादा देख लिया मैंने।"
"…क्या देख लिया?"
"बस जाओ। वक़्त आने पर तुम और मैं ख़ुद ही मिल लेंगे।"
उसका मतलब पूछने का मौका ही नहीं मिला। मून ऊनवू ने पत्ते समेटे, उठा और मुझे दुकान से बाहर धकेल दिया। पीठ पर एक धक्का। दरवाज़ा खुला, ठंडी हवा चेहरे से टकराई, और मैं गली के नुक्कड़ पर खड़ी थी। मुड़कर देखा तो वह दरवाज़े पर खड़ा, जैसे मक्खी उड़ा रहा हो, हाथ हिला रहा था।

और फिर दुकान का दरवाज़ा ग़ायब हो गया।
सच में ग़ायब हो गया। पीतल का बोर्ड, दरार से आती रोशनी, लकड़ी का दरवाज़ा। सुविधा स्टोर और बंद लॉन्ड्री के बीच, पहले की तरह, कल की तरह, सिर्फ़ एक सपाट दीवार थी।

क्या वह सपना था?
पर गोरी त्वचा, पतली कलाइयाँ और कंधों से नीचे गिरते लंबे बाल बता रहे थे कि यह सब सच है। मैंने हथेली खोली। तराशे हुए नाख़ून। किसी और का हाथ। यह सपना नहीं था।
अजीब लोग थे। और जब अजीब लोग हैं, तो उनकी बात मानकर देखती हूँ। वैसे भी कोई और रास्ता नहीं था।
अजीब तरह से बाहर बारिश थम चुकी थी। मैं सीधे गोसीवॉन लौट गई।
⁎
सीढ़ियाँ वैसी ही थीं। वही सीढ़ियाँ जिनसे मैं कल गिरी थी। अब भी गीली, और प्रॉपर्टी डीलर अंकल का चिपकाया "सीढ़ियाँ फिसलन भरी हैं, सावधान रहें" वाला काग़ज़ आधा उखड़कर फड़फड़ा रहा था। मैं उसके सामने खड़ी हो गई।
यहाँ मुझे करना क्या है।
उसने कहा था सोने की जगह मिल जाएगी। मेरा कमरा ऊपर है, पर चाबी नहीं है। इस शरीर का कमरा कहाँ है, यह भी नहीं पता। मैं बस खोई-सी खड़ी सीढ़ियों को ऊपर ताकती रही।
"सुनिए~"
पीछे से आवाज़ आई। मैं मुड़ी।
एक लड़का था, कोई पंद्रह साल का, मिडिल स्कूल के आख़िरी साल में। स्कूल यूनिफ़ॉर्म के ऊपर हुडी, हाथ में एक फ़ोन और एक छोटा बैग। वे मेरे नहीं थे। पर लड़के ने उन्हें मेरी ओर बढ़ा दिया।
"ये आपके हैं न, दीदी? जब आप पहले अस्पताल गई थीं, मैंने इन्हें रख लिया था ताकि कोई चुरा न ले।"

कहते हुए वह शरमा गया। दीदी। वह यह इस चेहरे को देखकर कह रहा था। मतलब कल जब यह शरीर यहाँ गिरा था, इस बच्चे ने देखा था।
"हैं? ओह… शुक्रिया।"
मैंने चीज़ें ले लीं। लड़का शायद झेंप गया, कुछ और कहने लगा, रुक गया, और जल्दी से कहीं भाग गया। सीढ़ियों के ऊपर नहीं, गली की ओर। पल भर में वह ओझल हो गया।
बैग हल्का था। छोटा-सा क्रॉसबॉडी बैग, जैसा लड़कियाँ रखती हैं। मैंने ऐसा बैग कभी नहीं उठाया था।
मैंने उसे खोला।
एक बटुआ, लिप बाम, ईयरफ़ोन। और एक अकेली चाबी। चाबी के छल्ले पर सफ़ेद टेप लिपटा था, और उस पर मार्कर से एक नंबर लिखा था।
307.
यह गोसीवॉन का कमरा नंबर था, ठीक उसी तरह लिखा जैसे यह गोसीवॉन अपने कमरों पर लिखता था। मेरा कमरा 208 था। यह मेरे ठीक ऊपर वाली मंज़िल थी।
यह औरत यहीं रहती थी।
हम सिर्फ़ सीढ़ियों पर नहीं टकराए थे। वह इसी इमारत में रहती थी। आधे साल से दिन में दो बार चढ़ी जाने वाली सीढ़ियों पर, जिससे मैं एक बार भी नहीं मिली थी। या शायद मिली थी और याद नहीं रहा। मैं दूसरों के चेहरे कम ही देखती थी। कोई वजह ही नहीं थी।
उसने कहा था सोने की जगह मिल जाएगी। उसका मतलब यही था।
मैं सीढ़ियाँ चढ़ी। दूसरी मंज़िल पार कर तीसरी पर। गलियारे के आख़िर से दूसरा, 307। चाबी अंदर गई। घूमी। दरवाज़ा खुल गया।
यह मेरे कमरे जितना ही बड़ा था। फिर भी बिल्कुल उल्टा।
आधे साल से मेरे कमरे में बस डिब्बे जमा होते रहे थे। इस कमरे में कोई जी रहा था। जी रहा था, और पूरी जान लगाकर जी रहा था।
एक पूरी दीवार काग़ज़ की थी। A4 पन्ने जोड़कर बना कैलेंडर, बॉलपेन की लिखावट से ठसाठस भरा। "○○ चिकन शाम 7 बजे" "मार्ट उद्घाटन सुबह 11 बजे" "वृद्धाश्रम भेंट" "फ़ेस्टिवल आवेदन — X" "फ़ेस्टिवल आवेदन — X" "प्रैक्टिस रूम 06:00"। सब आस-पास की जगहें। एक भी ब्रॉडकास्टर या बड़ा मंच नहीं। फिर भी लगभग कोई खाना ख़ाली नहीं था। कल की तारीख़ पर भी "○○ चिकन शाम 7 बजे" था, और उसके बगल में छोटे अक्षरों में, "उसके बाद घर"।
हैंगर पर प्लास्टिक कवर में एक पोशाक टँगी थी। चमकीला कपड़ा। मंच के कपड़े। आस्तीन के भीतर दूसरे रंग के धागे से सिलाई थी। किसी ने हाथ से मरम्मत की थी। नीचे फ़र्श पर स्नीकर्स के दो जोड़े। एक के तलवे आधे घिसे हुए, एक बिल्कुल नया और अब भी डिब्बे में। किसी ख़ास मौक़े के लिए सँभालकर रखा हुआ। मैं भी अपने जूते ऐसे ही सँभालती थी।

मेज़ पर सिर्फ़ मेकअप था। दवा-दुकान वाला सामान नहीं, बल्कि तरह-तरह की चीज़ों की कतारें। क्या यह वही नहीं जो टीवी वाले लोग इस्तेमाल करते हैं? उसके बगल में पट्टियों का एक डिब्बा, टख़ने की टेप का एक रोल, छालों की क्रीम। और एक नोटबुक।
मैंने नोटबुक खोली। गीत के बोल। हाथ से लिखे बोल, लाल पेन से काटे हुए, बदले हुए और फिर से बदले हुए। हाशियों पर: "यहाँ साँस" "ऊँचा नहीं, नीचा" "सबसे छोटी को बेहतर हिस्सा देना"। आख़िरी पन्ने पर बस एक पंक्ति थी।
आज भी एक और मंच।
मैंने नोटबुक बंद कर दी। मुझे लगा मैं समझ गई कि इस कमरे में कैसी ज़िंदगी जी जाती है। एक लड़की जो गाती है। जो वहाँ गाती है जहाँ कोई नहीं देखता।
मैंने बैग से बटुआ निकाला। इस बार खोलने में डर लगा। मैंने खोला। कुछ नोट, एक ट्रांज़िट कार्ड, और एक पहचान पत्र। मैंने नाम देखा। इस औरत का एक नाम था। वह बाईस साल की थी। मुझसे बारह साल छोटी। मैं वह नाम ज़ोर से नहीं पढ़ सकी। किसी और का नाम किसी और के मुँह से पढ़ना अजीब तरह से ग़लत लगा।
मैंने फ़ोन चालू किया। लॉक स्क्रीन। मुझे पासकोड नहीं पता था। पर जैसे ही स्क्रीन ऊपर उठाई, वह खुल गया।
चेहरा। यही चेहरा चाबी था।
सूचनाओं की बाढ़ आ गई। दर्जनों बिना पढ़े संदेश।
"कल प्रैक्टिस सुबह 10 बजे, देर मत करना"
"बॉस: अगले हफ़्ते ○○ मार्ट पक्का। मेहनताना 50,000 वॉन। चारों में बाँट लेना, माफ़ करना"
"फ़ेस्टिवल टीम: समीक्षा के बाद, इस बार हम आपके साथ काम नहीं कर पाएँगे"
"सबसे छोटी: दीदी आप ठीक हो?? कौन-सा अस्पताल T_T प्लीज़ फ़ोन उठाओ"
"सबसे छोटी: दीदी"
"सबसे छोटी: दीदी प्लीज़"
उन्नीस मिस्ड कॉल। सब एक ही नाम से।
मैंने फ़ोटो एल्बम खोला। एक जैसे कपड़ों में चार औरतें। यह चेहरा बीच में था। मंच कहलाने के लिए बहुत छोटा चबूतरा, सामने दस से भी कम लोग। उनमें से आधे अपने फ़ोन देख रहे थे। पर तस्वीर की चारों मुस्कुरा रही थीं। सच में मुस्कुरा रही थीं। अगली तस्वीर में भी, और उसके बाद वाली में भी। मंच हर बार छोटा था, और मुस्कानें हर बार बड़ी।
मैं बिस्तर पर बैठ गई।
यह वैसी ज़िंदगी थी जिसे मैं जानती थी। भोर में अकेले उठना जब किसी को परवाह नहीं। यह जानते हुए भी कि नहीं होगा, फिर से आवेदन भेजना। जूतों का एक जोड़ा डिब्बे में सँभालकर रखना। मैंने अपना बाईसवाँ साल ऐसे ही बिताया था। तीन पार्ट-टाइम नौकरियाँ करते हुए और नकसीर झेलते हुए। तब मेरे कमरे में भी ऐसा ही कैलेंडर था। बस मंचों की जगह शिफ़्ट का टाइमटेबल था।
पर मैं चौंतीस की उम्र में सीढ़ियों से गिरी, और यह लड़की बाईस की उम्र में मुझसे टकरा गई।
यह लड़की कहाँ गई?
यह ख़याल पहली बार आया। अस्पताल में, कैफ़े में, मैं सिर्फ़ अपनी फ़िक्र करती रही। मैं कहाँ हूँ, क्या मैं वापस जा सकती हूँ। एक बार भी नहीं सोचा कि इस शरीर की असली मालकिन अभी कहाँ है। यह कमरा देखकर ही समझ आया कि वह एक इंसान थी। जिसे कल सुबह दस बजे प्रैक्टिस रूम पहुँचना था, सबसे छोटी को वापस फ़ोन करना था, और अगले हफ़्ते मार्ट के उद्घाटन में मंच पर खड़ा होना था।
और उस शरीर के बारे में भी, वहीं जवाब मिलेंगे।
यह जवाब नहीं था। जवाब की जगह मुझ पर एक कर्ज़ चढ़ गया। जैसे मैंने किसी का शरीर उधार नहीं लिया, बल्कि किसी का पूरा दिन छीन लिया हो।
और उस आदमी ने आख़िर मेरे मन में देखा क्या था? बेचारा, या रहने दो? उसका मतलब क्या था कि उसने ज़रूरत से ज़्यादा देख लिया?
वक़्त आने पर तुम और मैं ख़ुद ही मिल लेंगे।
वे शब्द बार-बार मन में घूमते रहे। ग़ायब होते दरवाज़े से ज़्यादा, उड़ते पत्तों से ज़्यादा, वही शब्द सबसे ज़्यादा ठहरे रहे।
फ़ोन फिर बजा। सबसे छोटी। उन्नीस कॉल जो मैंने नहीं उठाई थीं। बीसवीं मैंने उठा ली। पता नहीं क्यों। शायद इसलिए कि "दीदी प्लीज़" मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा था।
"दीदी!! दीदी, आप ठीक हो?? अभी कहाँ हो, अस्पताल में? बॉस ने बताया आप सीढ़ियों से गिर गईं, मैं तो बहुत…"
वह रो रही थी। वह आवाज़ सुनते ही जो मेरे मुँह से निकला, वह मेरी आवाज़ नहीं थी। नहीं, वह मेरी ही आवाज़ थी। यही तो मुसीबत थी। वह कुछ ज़्यादा ही मेरी थी।
"अरे रे, अरी, रो मत अब। दीदी ठीक है। बस ज़रा लुढ़क गई, और कुछ नहीं। लोग लुढ़कते भी हैं और जीते भी हैं, समझी।"
ख़ामोशी।
"…दीदी?"
"क्या? खाना खाया कि नहीं? फिर से कप नूडल्स खा लिए न? कल दस बजे प्रैक्टिस है, देर मत करियो, जल्दी सो जा। दीदी कल मिलके बात करेगी, ठीक?"
"…दीदी, आपकी आवाज़ ऐसी क्यों…"
"क्यों? लगता है सर्दी लग गई। फ़ोन रख रही हूँ, सो जा। दरवाज़ा ठीक से बंद करियो।"
मैंने फ़ोन रख दिया। फिर देर तक फ़ोन को घूरती रही।
मैंने अभी क्या कह दिया?
वह बुसान की बोली थी, जो सोल में नौकरी करते पूरे वक़्त एक बार भी नहीं निकली थी, न क्लाइंट के सामने, न बॉस के सामने। और मुश्किल से बीस साल की एक बच्ची के रोने की आवाज़ पर सब बाहर फूट पड़ी। वह भी साफ़-साफ़ तीस पार वाले लहजे में। ठीक वैसे ही जैसे मैं दस-दस पार्ट-टाइम नौकरियों में रोते जूनियरों को चुप कराती थी। खाना खाया कि नहीं, दरवाज़ा ठीक से बंद करियो। मैं उसकी बड़ी बहन कम और मौसी ज़्यादा लग रही थी।
सबसे छोटी का मैसेज आया।
"दीदी, आप सच में ठीक हो न…?"
ठीक? पूरी तरह तो नहीं। मैंने जवाब नहीं दिया। फिर कंबल बिछा लिया।
उसमें किसी और की महक थी। पसीना, दर्द-निवारक पट्टियाँ, और सस्ता शैम्पू। उस महक में, चौंतीस साल में पहली बार, मैं किसी और के बिस्तर पर लेटी।
मेरी तो क़िस्मत ही ऐसी है।
पर आज, वे शब्द कभी बाहर नहीं आए।
(एपिसोड 2 समाप्त)